Sunday, August 8, 2010

prarambh

प्रिय मित्रों ,
                  इस तमाशे में फंसे एक तमाशबीन की व्यथा को व्यक्त करने का प्रयास कर रहा हूँ .आप बुद्धिजीवियों से निवेदन है की कृपया अपने सुझाव ,शिकायतें भेज कर मुझे कृतार्थ करें और दैनिक कार्यों में फंसे तमाशबीन ही नहीं बने रहे बल्कि यदि समाज के हित में कुछ भी कर पाएं तो अपना बहुमूल्य योगदान दें .अपने आस पास लोगों को प्रेरित करें ,हर छोटी सी छोटी कोशिश रंग लाएगी .यदि हम अब भी समाज में तमाशबीन ही बने रह गए तो  पूंजीपतियों के रचे  तमाशे को देख  आंसू ही बहा पाएंगे .
कैसी है ये बस्ती   कैसे हैं ये लोग
कुछ सोयी हुई सी आखें हैं ,कुछ जागी हैं पर बंद.
कुछ जागी हैं और खुली भी और देख रही तमाशा हैं
तमाशे में रोते हुए भी इनमे आशा है ,
कभी तो खुलेंगी वो जागी, पर बंद आखें 
आखिर कब तक रुलाएगा ये तमाशा ,और रोते रहेंगे tamashbeen